*अहसास–ए–कमतरी के मारे हुए,
ख़ुद ही ख़ुद से हैं हारे हुए,
उन्हें कोई क्योंकर देगा शिकस्त,
जिनके हौंसले यूँही हैं पस्त,
अपनी नज़रों में जो ख़ुद को आंकें कम,
ओढ़ लें जो बेवजह के ग़म,
जिन पे कमतरी का गहरा साया है,
उन्हें कब कोई समझा पाया है,
ज़रूरी है ख़ुद में मुतमईन और भरा पूरा होना,
ताकि न पड़े ज़िंदगी के नायाब लम्हों को खोना,
लाज़िम है अपने पाँवों पे मज़बूती से खड़ा होना,
ताकि ख़ुशनुमा हो ज़िंदगी, न पड़े बेवजह रोना!
*inferiority complex(हीन भावना)
अरुण भगत
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