राम नाम तोते मानिंद बोले,
राम न पाया कोये,
अंतर्मन की जो आँख न खोले,
रहे पड़ा वो सोए!
राम तो है घट में विराजे,
सुंदर उसकी छवि है साजे,
अंदर उसकी ख़ुशबू फैले,
कहाँ जानें जो मन हैं मैले?
राम हमारे साथ हैं जगते,
साथ हमारे हैं वो सोते,
फिर हम क्यों बेचैन हैं होते,
क्यों हाथ मलते, क्यों हैं रोते?
नस नस में है जो बसता,
साथ है रोता, संग है हंसता,
उसे पाने को बाहर हैं फिरते,
एड़ी घिसते, पड़ते गिरते,
सब के अंदर जो एक रहता,
उसके नाम पे लड़ते फिरते!
मूढ़ मति हम भेद न पाएँ ,
जो अंग संग, उससे दूर हम जाएँ ,
जहालत के हैं जब बादल छाएँ ,
यूँ ही औंधे गिरें हम और यूँ ही हैं मुँह की खाएँ!
ऊपर नीचे, बाहर अंदर,
उसे ही देखे मस्त कलंदर,
उसी का सुनाई देता नाद चहूं ओर,
फिर भी हम क्यों न करते गौर?
अरुण भगत
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Kya khoob likha h sir❣️❤👍👍
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धन्यवाद! खुश रहिए, प्रभु की मौज में रहिए!
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धन्यवाद, सपना जी! सब राम जी की कृपा है!
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Very nice sir..👌
Beautifully written
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बहुत बहुत धन्यवाद, प्रिया जी! अंतर्मन में बैठे राम को जानिए और आनंदित रहिए!
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जय श्री राम🙏🙏🙏
बहुत सुंदर Sir💐💐💐
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बहुत बहुत धन्यवाद, मीनाक्षी जी! सुंदर वही जो घट घट में है बसता!
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Bahut khoob!!!!
ATI uttam:)
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शुक्रिया, नेहा जी! बहुत ख़ूब है वो जो इस कविता की प्रेरणा है!
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Very nice sir💞
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धन्यवाद, साहिल! खुश रहिए, अपने अंदर बैठे राम में रमिए!
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