न अपनों से कर गुज़ारिश कोई,
फिर अपनेपन का भरम नहीं रहता,
न कर ज़ुबान का इस्तेमाल ज़्यादा,
फिर ज़हानत का भरम नहीं रहता,
न खैंच किसी बात को बहुत ज़्यादा,
फिर वापसी का कोई रास्ता नहीं रहता,
न तोड़ किसी के भी नाज़ुक दिल को,
फिर जोड़ने का कोई ज़रिया नहीं रहता !
न डूब जा अपने प्यार में इतना गहरा,
फिर दूसरों से कोई नाता नहीं रहता!
न बदहवासी में हो यूँ गाफ़िल,
फिर होशो हवास नहीं रहता,
न पी-पी कर खुद को हलकान इतना,
फिर पीने का भी कोई असर नहीं रहता,
न ख़ुदा को ले खड़े सवाल इतने,
फिर खुदाई पे भरोसा नहीं रहता!
न कटहरों में खुद को खड़ा कर इतना,
फिर खुदी पर भी भरोसा नहीं रहता,
न बना ज़िंदगी को इतना बेरंग और बेरौनक़,
फिर रंगों का कोई मायना नहीं रहता!
न हर बात को बना आन का मसला,
फिर वजूद का कोई ज़ायक़ा नहीं रहता!
अपने पैमानों के चलते न कर सब को दूर इतना,
फिर कोई कहने को भी अपना नहीं रहता!
अरुण भगत
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Sir doing expectations especially from close one hurts a lot in today’s world so except less you will be hurt less😇🤞
Well said sir!!
❤❤
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Thank you, Sapna! Good to see that the poem has been well received by the reader in you! Stay blessed.
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Beautiful poem Sir. Every single line is so touching and real.
Regards
SNEHLATA
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Thank you very much, Snehlata Ji! Happy to see the poem being so well received by you! Stay blessed.
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Beautiful and impressive poetry sir..
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Thanks a ton, Priya dear! Good to see you respond so favourably to the composition! God bless you!
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Bahut khoob Sir!!!!
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बहुत बहुत धन्यवाद, नेहा जी, आपकी सराहना और श्लाघा के लिए! खुश रहिए, आबाद रहिए!
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Very nice sir💞💞
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Thanks a lot, Sahil dear, for being so nice about your response! Stay happy.
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अति खूब प्रोफेसर साहब! यह अति आवश्यक है कि हम अपने जीवन में अपनी जुबान का प्रयोग करते समय तथा अपने आचार और विचार में संयम रखें! ऐसे जीवन व्यतीत करने से हम शांत और सुखी रहेंगे तथा हमारे संबंध भी खूबसूरत रहेंगे!
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बिलकुल सही कहा आपने, भाई! आपकी प्रबुद्ध प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद!
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