आसान नहीं, मुश्किल है इस ज़माने में जीना,
कहाँ मुमकिन है चाक दामन को सीना!
अपनी रूह पे लगे पैबंद कैसे छुपाएँ,
रोते सिसकते हुए मन को कैसे हसाएँ?
कैसे बदलें इस वक्त की बेनूरी को नूर में,
कैसे पाएँ सकूँ झूठ मूठ के सरूर में?
कैसे बंजर ज़मीन पर उगाएँ प्यार की फसल,
कैसे झूठे नक़ली इंसानों में ढूँढें कुछ असल?
कैसे बेज़ारी के आलम में दिलाएँ किसी को भरोसा,
कैसे लौटा लाएँ उस ईमान को जिसे इस बेमुरव्वत दौर ने है खोंसा?
बिन पेंदे के लोटों की तरह हो गये हैं लोग,
मौक़ा परस्ती का लग गया है सब को रोग!
लालच और हवस की आग में दुनिया हो रही है राख,
न बचा किसी का ईमान, न रही है साख!
वहशीपन के इस जंगल में आओ ढूँढें कोई रास्ता,
आओ कुछ तो करें तुम्हें ख़ुदा का है वास्ता!
अरुण भगत
Awesome 🌸🌸
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Thank you very much, Sapna dear! I do not know about the poem but your response is indeed awesome! Stay blessed.
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Bahot hi khoob..👌
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बहुत बहुत शुक्रिया, प्रिया जी! खुश रहिए, आबाद रहिए!
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Outstanding!!!!!!
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Thank you very much, Neha Ji! Don’t know about outstanding but I am happy that you liked the composition.
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वाह प्रोफ़ेसर साहब। लोगों की ज़मीर जगाने का एक सूंदर प्रयास।
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अच्छे के लिए कुछ न कुछ कोशिश करते रहना चाहिए, जोगेश भाई! आपकी सराहना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
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