जीवन की हर गिरह जो खोली

जीवन की हर गिरह जो खोली

तो वह मुस्कुरा के बोली,

जितना गहरा भी तूँ जाएगा,

जीवन की थाह न पाएगा!

जीवन है अथाह सागर,

न समेट पाए इसे कोई गागर!

यह है अनंत और विशाल,

इसे ले खड़े हैं कई सवाल!

हर जवाब में हैं कई और सवाल,

ऐसा ही है जीवन, मन में न रख कोई मलाल!

जीवन है विशाल और हम हैं गौण,

शायद जान पाएँ कुछ रह कर मौन!

न मचा बवाल, न पाल कोई भ्रम,

मैं को दे निकाल तो पाएगा हर ओर ब्रह्म!

ब्रह्म से उपजी यह सृष्टि, ब्रह्म में ही होगी लीन,

स्वयं को यूँ जान जैसे अपार सागर में हो मीन!

एक जीवाणु के सामने समस्त विज्ञान है मुँह बायें खड़ा,

कौन है जीता अगर नियति से है वह लड़ा?

मौन में है ध्यान और ध्यान में है ज्ञान,

यही शाश्वत सत्य है, यही जीवन विज्ञान!

अरुण भगत

Published by Arun Bhagat

I love to talk through my writings.@

12 thoughts on “जीवन की हर गिरह जो खोली

  1. Very true Sir, Hume ye ‘me,’ nikal dena chahiye, pata nahi kitni jindagi he, shanti aur sath milkar hi ji ja sakti he.
    Awesome poem Sir
    Regards
    Snehlata

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    1. धन्यवाद, मैडम! यह मैं का खेल माया का खेल है। इस से निकल पाने के लिए ईश्वर की असीम कृपा अपने तक पहुँचने देंगे तो ही बात बनेगी!

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  2. You have nicely explored the depth of life, though it is impossible to fathom its entire depth
    Very well written
    Carry on Jeeves

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  3. बहुत सुंदर सर 🙏🙏💐💐
    मन में है ध्यान और ध्यान में है ज्ञान।

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  4. आपकी अति सुन्दर कविता ने जीवन की अनेक गिरह खोल दीं, प्रोफेसर साहब!

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    1. धन्यवाद, जोगेश जी! कविता तो क्या करेगी, गिरह तो सब खुद ही खोलनी पड़ेंगीं। प्रयास करने भी खुलेंगी या नहीं, यह तो प्रभु ही जानते हैं!

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