जीवन की हर गिरह जो खोली
तो वह मुस्कुरा के बोली,
जितना गहरा भी तूँ जाएगा,
जीवन की थाह न पाएगा!
जीवन है अथाह सागर,
न समेट पाए इसे कोई गागर!
यह है अनंत और विशाल,
इसे ले खड़े हैं कई सवाल!
हर जवाब में हैं कई और सवाल,
ऐसा ही है जीवन, मन में न रख कोई मलाल!
जीवन है विशाल और हम हैं गौण,
शायद जान पाएँ कुछ रह कर मौन!
न मचा बवाल, न पाल कोई भ्रम,
मैं को दे निकाल तो पाएगा हर ओर ब्रह्म!
ब्रह्म से उपजी यह सृष्टि, ब्रह्म में ही होगी लीन,
स्वयं को यूँ जान जैसे अपार सागर में हो मीन!
एक जीवाणु के सामने समस्त विज्ञान है मुँह बायें खड़ा,
कौन है जीता अगर नियति से है वह लड़ा?
मौन में है ध्यान और ध्यान में है ज्ञान,
यही शाश्वत सत्य है, यही जीवन विज्ञान!
अरुण भगत
Very true Sir, Hume ye ‘me,’ nikal dena chahiye, pata nahi kitni jindagi he, shanti aur sath milkar hi ji ja sakti he.
Awesome poem Sir
Regards
Snehlata
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धन्यवाद, मैडम! यह मैं का खेल माया का खेल है। इस से निकल पाने के लिए ईश्वर की असीम कृपा अपने तक पहुँचने देंगे तो ही बात बनेगी!
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Waaww sir👌👌
Amazing…
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धन्यवाद, प्रिया जी! हर्ष का विषय है कि रचना आपके मन को भायी!
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You have nicely explored the depth of life, though it is impossible to fathom its entire depth
Very well written
Carry on Jeeves
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Thank you very much, Arun Ji, for your appreciation and your very pertinent comment! Stay blessed.
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Very well expressed and deep thoughtful
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Thank you, Sarika Ji! Happy to see you responding so positively to the composition! Stay blessed.
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बहुत सुंदर सर 🙏🙏💐💐
मन में है ध्यान और ध्यान में है ज्ञान।
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धन्यवाद, ममता जी! ध्यान और ज्ञान का गहन सम्बंध तो है ही!
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आपकी अति सुन्दर कविता ने जीवन की अनेक गिरह खोल दीं, प्रोफेसर साहब!
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धन्यवाद, जोगेश जी! कविता तो क्या करेगी, गिरह तो सब खुद ही खोलनी पड़ेंगीं। प्रयास करने भी खुलेंगी या नहीं, यह तो प्रभु ही जानते हैं!
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